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बालको में जोगी कांग्रेस का ‘खटिया खड़ी’ आंदोलन फ्लॉप, कुर्सियां रहीं खाली, सुरक्षा बल ज्यादा और प्रदर्शनकारी कम

कोरबा| क्षेत्र में रोजगार और स्थानीय मांगों को लेकर जोगी कांग्रेस द्वारा आयोजित ‘खटिया खड़ी’ आंदोलन पूरी तरह बेअसर साबित हुआ। बालको प्रबंधन के खिलाफ हुंकार भरने आए पार्टी सुप्रीमो अमित जोगी को उस समय असहज स्थिति का सामना करना पड़ा, जब सभा स्थल पर जनता की जगह खाली कुर्सियां नजर आईं। आलम यह था कि कार्यक्रम स्थल पर आंदोलनकारियों से अधिक संख्या पुलिस बल की दिखाई दे रही थी।


भीड़ जुटाने में नाकाम रहा संगठन

जानकारी के मुताबिक, जोगी कांग्रेस ने इस आंदोलन को बड़ा रूप देने के लिए व्यापक स्तर पर तैयारियां की थीं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट रही। कार्यक्रम स्थल पर लगाई गई सैकड़ों कुर्सियां खाली पड़ी रहीं। स्थानीय लोगों और मजदूरों ने इस आंदोलन से दूरी बनाए रखी, जिससे आंदोलन की धार कुंद पड़ गई।


विफलता के 3 मुख्य कारण

  • कमजोर संगठन: बालको क्षेत्र में जोगी कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा बेहद कमजोर नजर आया। पार्टी अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को भी कार्यक्रम स्थल तक लाने में विफल रही।
  • मजदूरों की अरुचि: स्थानीय मजदूरों का मानना है कि आंदोलन में उठाए गए मुद्दे उनके मुख्य हितों से मेल नहीं खाते थे। मुद्दों की प्रासंगिकता की कमी के कारण श्रमिकों ने भागीदारी नहीं की।
  • राजनीतिक स्टंट का ठप्पा: क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों के अनुसार, यह आंदोलन समस्याओं के समाधान के बजाय केवल आगामी चुनावों के मद्देनजर अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने का एक प्रयास मात्र था।

“आंदोलन में उठाए गए मुद्दे व्यावहारिक नहीं थे। यह केवल एक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की कोशिश थी, जिसमें पार्टी पूरी तरह विफल रही।”
— स्थानीय नागरिक, बालको

सुरक्षा के कड़े पहरे में खाली मैदान
प्रशासन ने आंदोलन की घोषणा को देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। भारी संख्या में पुलिस बल और सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई थी। विडंबना यह रही कि सभा के दौरान पुलिसकर्मी आपस में चर्चा करते दिखे, क्योंकि आंदोलनकारियों की भीड़ इतनी भी नहीं थी कि उसे नियंत्रित करने के लिए इतने बल की आवश्यकता पड़े।


सवालों के घेरे में पार्टी पदाधिकारी

स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि पार्टी के पदाधिकारियों ने केंद्रीय नेतृत्व को जनसमर्थन के बारे में गलत जानकारी दी थी। जमीनी फीडबैक और वास्तविक स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर होने के कारण न केवल आंदोलन असफल हुआ, बल्कि क्षेत्र में पार्टी की साख पर भी सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।