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बालको की ‘मोर जल मोर माटी’ पहल: मूंगफली की खेती बनी कोरबा के किसानों की समृद्धि का नया आधार

खेती में आधुनिकता का समावेश पारंपरिक तरीकों को छोड़ वैज्ञानिक पद्धति से उत्पादन बढ़ा रहे हैं ग्रामीण किसान।

​कोरबा | 07 अप्रैल, 2026 छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में पारंपरिक खेती की तस्वीर तेजी से बदल रही है। भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) की सामाजिक सरोकार की पहलों ने धान पर निर्भरता कम कर किसानों को मूंगफली जैसी नकदी फसलों की ओर मोड़ा है। कंपनी की ‘मोर जल मोर माटी’ परियोजना के तहत अब तक 40 गांवों के 9,000 से अधिक किसानों को आधुनिक कृषि और जल प्रबंधन से जोड़ा जा चुका है। कभी केवल घरेलू उपयोग तक सीमित रहने वाली मूंगफली आज इस क्षेत्र के किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक सशक्त और लाभकारी माध्यम बन चुकी है।

परंपरा से आधुनिकता की ओर एक सफल बदलाव

​पहले बाजार तक पहुंच की कमी और तकनीकी जानकारी के अभाव में किसान मूंगफली की खेती से कतराते थे। बालको ने इस खाई को पाटने के लिए किसानों को उन्नत बीज, खाद और वैज्ञानिक खेती का प्रशिक्षण दिया। अब किसान लाइन से बुवाई (Line Sowing), बीज उपचार और संतुलित उर्वरक प्रबंधन जैसी तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। इस बदलाव का असर आंकड़ों में साफ दिखता है—जहाँ पहले महज 50 किसान इस फसल से जुड़े थे, आज उनकी संख्या बढ़कर 1,000 के पार पहुंच गई है।

लागत कम, मुनाफा ज्यादा: किसानों की जुबानी

​परियोजना का लाभ उठा रहे किसानों के जीवन में बड़ा आर्थिक सुधार आया है। प्रति एकड़ 8 से 10 क्विंटल उत्पादन के साथ किसान अब ₹45,000 से ₹55,000 तक की अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।

  • सुनीता राठिया (भटगांव): “धान में पानी और लागत अधिक लगती थी। बालको की मदद से पहली बार मूंगफली उगाई, जिसमें कम पानी लगा और मुनाफा ज्यादा मिला। अब मैं इसे और बड़े पैमाने पर करने की योजना बना रही हूँ।”
  • कन्हैया लाल (बुंदेली): “आधुनिक तकनीकों ने मेरी पैदावार को 8 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुँचा दिया है। अब मैं माइक्रो-इरिगेशन अपनाकर खेती को और स्मार्ट बनाने की दिशा में बढ़ रहा हूँ।”

मिट्टी की सेहत और जल संरक्षण का संगम

​मूंगफली की खेती न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी है, बल्कि यह पर्यावरण और भूमि के लिए भी वरदान साबित हो रही है। फसल चक्र बदलने से मिट्टी की उर्वरकता में सुधार हो रहा है, जिससे अगली फसलों की पैदावार भी बेहतर हो रही है। साथ ही, कम पानी की खपत वाली यह फसल जल संरक्षण के लक्ष्यों को भी पूरा कर रही है। बालको की यह पहल तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और बाजार संपर्क के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक ‘रोल मॉडल’ बनकर उभरी है।