कोरबा/नगर पालिक निगम कोरबा में इन दिनों विकास का एक ऐसा अनोखा गाथा लिख रहा है, जिसे देखकर सुन कर आप भी अपना सिर पकड़ लेंगे, दरअसल मामला शहर के व्यस्ततम साप्ताहिक बुधवारी बाजार क्षेत्र का है, जहाँ निगम ने पहले सरकारी खर्च पर दुकानों का निर्माण कराया गया फिर अचानक उन्हें तोड़कर मलबे में तब्दील कर दिया गया,

इसपर सवाल करने से निगम का दुकानों को तोड़ने के पीछे का तर्क है कि अब यहाँ लेंटर डालकर नए सिरे से निर्माण किया जाएगा,अब यहाँ सवाल यह उठता है कि जब लेंटर ही डाल कर पक्का करना था तो शुरुआती प्लानिंग में यह बात क्यों शामिल नहीं थी ? क्या निगम इसका पहले ‘डेमो वर्जन’ बनाकर देखना चाह रहा था कि कैसा दिखता है और अब ‘अपडेटेड वर्जन’ लाने की तैयारी है ?
शायद निगम के पास बजट इतना ज्यादा है कि उसे ठिकाने लगाने के लिए ‘बनाओ-तोड़ो-फिर बनाओ’ वाली नीति अपनाई जा रही है,वही स्थानीय लोगों का कहना है कि यह विकास कम और सरकारी पैसे का बन्दर-बाट ज्यादा लग रहा है,इस पूरी प्रक्रिया में जो जनता का पैसा मलबे में मिला, उसका जिम्मेदार कौन है…???




