रायगढ़ का गौरव कहा जाने वाला चक्रधर समारोह क्या अब अपनी पहचान खोने की राह पर है…?
रायगढ़ /10 दिनों तक चलने वाला चक्रधर समारोह रामलीला मैदान में चल रहा है,जिला प्रशासन हर वर्ष की तरह इस बार भी टेंट, लाइट, मंच, आवास और अन्य व्यवस्थाओं में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है, लेकिन व्यवस्था और आयोजन की कलात्मक दिशा दो अलग बातें हैं,इस बार सबसे बड़ा सवाल कलाकारों के चयन और कार्यक्रम की गुणवत्ता को लेकर है, 41 वर्षों की परंपरा वाले इस समारोह को आखिर किस दिशा में ले जा रहे है…?

जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है, उनसे सवाल भी होंगे– आयोजन से जुड़े जिम्मेदार लोगों में एक प्राचार्य और एक प्रोफेसर की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं,जो विगत कई वर्षो से अपने गजब की कलाकारी के दम पर मंच पर राज कर रहे है और अपने मूल कार्य से भटक गए है, सवाल यह है कि क्या आयोजन की जिम्मेदारी निभाते हुए अपने संस्थानों की जिम्मेदारियों से समझौता तो नहीं हो रहा?
यदि किसी स्कूल में अनुशासन या सुरक्षा से जुड़ी गंभीर स्थिति उत्पन्न होने की बात सामने आती है, तो उस स्थिति में प्राचार्य की प्राथमिक जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए,यह सवाल जनता पूछ सकती है, इसी तरह, यदि किसी प्रोफेसर की भूमिका आयोजन में इतनी प्रमुख हो कि मंच पर लंबे समय तक माइक उनके हाथ में रहे, तो सवाल यह भी उठेगा कि क्या चक्रधर समारोह का मंच किसी व्यक्ति विशेष के प्रदर्शन और लंबी वक्तव्यबाजी के लिए है या कलाकारों के लिए..?
चक्रधर समारोह किसी की व्यक्तिगत जागीर नहीं है, यह रायगढ़ की जनता और 41 वर्षों की सांस्कृतिक विरासत है,
कलाकार चयन में इतनी बड़ी चूक क्यों..?
चक्रधर समारोह कोई सामान्य म्यूजिकल नाइट नहीं है,यह वह मंच है जहां शास्त्रीय संगीत, लोककला, पारंपरिक संगीत और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान होना चाहिए,
अगर कलाकारों का चयन सिर्फ भीड़ और मनोरंजन के आधार पर होने लगे तो फिर सवाल उठेगा कि आखिर इस समारोह और किसी सामान्य सांस्कृतिक कार्यक्रम में अंतर क्या रह जाएगा..?
अमित साना के चयन पर सवाल– मुझसे अगर कार्यक्रम तय होने से पहले राय मांगी जाती तो मैं साफ कहता,अमित साना का चयन चक्रधर समारोह की मूल प्रकृति के अनुरूप नहीं है, यह उनकी गायकी की गुणवत्ता पर टिप्पणी नहीं है,वे फिल्मी गीतों के मंच पर उपयुक्त हो सकते हैं और राज्य उत्सव जैसे कार्यक्रमों में उनकी प्रस्तुति रखी जा सकती है,लेकिन चक्रधर समारोह की अपनी सांस्कृतिक पहचान है,
अगर किसी कलाकार की मुख्य पहचान फिल्मी गीतों से है और वह सूफी, कव्वाली या शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट विधाओं के लिए स्थापित नहीं है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि चक्रधर समारोह के मंच के लिए उसका चयन आखिर किस आधार पर किया गया ?
कल अगर यही चयन प्रक्रिया चलती रही तो वह दिन दूर नहीं जब शास्त्रीय और लोक संगीत के इस प्रतिष्ठित मंच पर ऐसे गीत सुनाई देंगे जिनका इस समारोह की परंपरा से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होगा, फिर नाम चक्रधर समारोह रहेगा, लेकिन उसकी आत्मा कहां बचेगी?
जिला प्रशासन संसाधन दे सकता है, शानदार मंच बना सकता है, रोशनी और टेंट लगा सकता है,लेकिन मंच पर प्रस्तुत होने वाली कला का स्तर और कलाकारों का चयन ही अगर समारोह की पहचान के विपरीत हो जाए तो सारी भव्यता सिर्फ बाहरी सजावट बनकर रह जाएगी,
41 साल की विरासत को कुछ लोगों की चयन प्रक्रिया के प्रयोगों की कीमत नहीं चुकानी चाहिए,,
भीड़ जुटाना आसान है। तालियां बटोरना आसान है। मनोरंजन कराना आसान है। मुश्किल है—41 वर्षों की सांस्कृतिक विरासत की गरिमा को कायम रखना। और आज सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या चक्रधर समारोह की गरिमा बचाई जाएगी, या उसे धीरे-धीरे एक सामान्य मनोरंजन कार्यक्रम में बदल दिया जाएगा ?




