रायगढ़ /कुटकुट नदी से लंबे समय से चल रहे अवैध रेत उत्खनन के काले कारोबार पर आखिरकार वन विभाग ने ऐसा शिकंजा कसा है, जिसकी गूंज पूरे क्षेत्र में सुनाई दे रही है,दरअसल गुप्त सूचना के आधार पर वन विभाग की टीम ने सुनियोजित रणनीति के तहत जंगल के भीतर घेराबंदी कर रेत से लदे करीब एक दर्जन ट्रैक्टरों को जब्त कर लिया।

कार्रवाई इतनी अचानक और सटीक थी कि रेत माफियाओं को संभलने तक का मौका नहीं मिला,सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि जब्त किए गए किसी भी ट्रैक्टर में नंबर प्लेट नहीं लगी थी,यानी कानून को खुलेआम ठेंगा दिखाकर बिना पहचान वाले वाहनों से रोजाना रेत की तस्करी की जा रही थी।
यह सिर्फ अवैध खनन नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को चुनौती देने जैसा मामला माना जा रहा है,रेत माफियाओं ने वन क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए जंगल के बीचों-बीच अवैध कच्चा मार्ग तैयार कर लिया था।
इसी रास्ते से दिन-रात सैकड़ों घनमीटर रेत बाहर निकाली जा रही थी,प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट का यह खेल लंबे समय से जारी था, लेकिन इस बार वन विभाग की दबिश ने पूरे नेटवर्क की पोल खोल दी,
इस बड़ी कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल खनिज (माइनिंग) विभाग की भूमिका पर खड़ा हो गया है। जिस अवैध कारोबार की भनक आम लोगों को थी, उस पर जिम्मेदार विभाग की नजर क्यों नहीं पड़ी?
आखिर बिना नंबर प्लेट वाले ट्रैक्टर लगातार रेत ढोते रहे और कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्षेत्र में अब यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या विभागीय लापरवाही ने ही रेत माफियाओं के हौसले बुलंद किए?
क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज है कि इस अवैध कारोबार के पीछे कुछ प्रभावशाली लोगों का संरक्षण था। कार्रवाई के बाद मामले को कमजोर करने और जब्त ट्रैक्टरों को छुड़ाने के प्रयासों की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं,
लेकिन अब सभी की निगाह इस बात पर है कि जांच कितनी निष्पक्ष होती है और क्या असली मास्टरमाइंड तक कानून का हाथ पहुंच पाता है ??
वन विभाग की इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो रेत माफियाओं के सबसे मजबूत नेटवर्क को भी ध्वस्त किया जा सकता है,
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ ट्रैक्टर जब्ती तक सीमित रहेगी या फिर अवैध उत्खनन के पूरे सिंडिकेट, उसके संचालकों और संरक्षण देने वालों तक भी जांच पहुंचेगी,




