रायपुर /दाई कैंटीन जहां थाली में सिर्फ भोजन नहीं, अपनापन भी परोसा जाता है! दाई कैंटीन पर मुझसे पहले भी बहुतों ने बहुत कुछ लिखा है। मैं भी कुछ नया नहीं कह रहा। बस दोपहर में खाने के लिए अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए मन में जो भाव आए, उन्हें शब्द दे रहा हूं।
किसी शहर की पहचान केवल ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से नहीं बनती, बल्कि उन जगहों से बनती है जो लोगों के दिलों में घर कर जाती हैं। नवा रायपुर -अटल नगर की दाई कैंटीन ऐसी ही एक पहचान बन चुकी है।

यहां थाली में परोसा गया भोजन केवल स्वाद नहीं देता, बल्कि घर की याद भी दिला देता है। पहला निवाला लेते ही मां के हाथों के खाने का एहसास हो जाए, तो समझिए वहां सिर्फ भोजन नहीं, अपनापन परोसा जा रहा है।
भारत में ऐसी कई कहानियां हैं। दिल्ली का बाबा का ढाबा, मुंबई का आनंद वड़ा पाव, इंदौर का जोशी दही बड़ा हाउस या लखनऊ का टुंडे कबाबी, इनकी पहचान बड़े विज्ञापनों से नहीं, बल्कि लोगों के भरोसे और स्नेह से बनी। दाई कैंटीन भी उसी विश्वास की एक नई कहानी लिख रही है।
यहां लोग सिर्फ सस्ता भोजन करने नहीं आते, बल्कि इसलिए लौट-लौटकर आते हैं क्योंकि यहां मुस्कुराकर स्वागत होता है, सम्मान मिलता है और खाने में घर जैसी आत्मीयता महसूस होती है।
कल नया रायपुर में बड़े होटल और आधुनिक फूड कोर्ट और भी बनेंगे, लेकिन किसी शहर की आत्मा ऐसी ही जगहों में बसती है, जहां रिश्तों की गर्माहट बची रहती है।
शायद आने वाले समय में नया रायपुर आने वालों से लोग यही कहें “एक बार दाई कैंटीन का खाना जरूर खाइए। वहां सिर्फ पेट नहीं भरता, मन भी भर जाता है।”
दाई कैंटीन केवल एक भोजन का स्थान नहीं, बल्कि उस भारत की खूबसूरत तस्वीर है, जहां मेहनत सबसे बड़ी पूंजी है, सादगी सबसे बड़ी पहचान है और मां के हाथों के स्वाद की तलाश आज भी हर दिल में ज़िंदा है।




