युक्तियुक्तकरण की आड़ में फल-फूल रहा था तबादला कारोबार, आरोपी शिक्षक बना ‘मोहरा’?
कोरबा, 17 जुलाई।
शिक्षा विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार एक बार फिर उजागर हुआ है। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने गुरुवार को कोरबा जिले में कार्यरत एक शिक्षक को दो लाख रुपये की रिश्वत लेते रंगेहाथ गिरफ्तार किया। यह रिश्वत युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया के तहत महिला शिक्षिका का तबादला पास के स्कूल में कराने के एवज में मांगी गई थी।
🔹 यह है पूरा मामला
9 जुलाई 2025 को प्राथमिक शाला केसला के प्रधान पाठक रामायण पटेल ने एसीबी, बिलासपुर इकाई में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी, जो उसी स्कूल में शिक्षिका हैं, का ट्रांसफर किसी दूरस्थ विद्यालय में होने की संभावना थी। इसी को रोकने तथा ओमपुर जैसे नजदीकी स्कूल में तबादला करवाने के लिए माध्यमिक शाला बेला में पदस्थ शिक्षक विनोद कुमार साण्डे ने अपने डीईओ और बीईओ से संबंधों का हवाला देते हुए 2 लाख रुपये की मांग की।
शिकायत के बाद एसीबी ने मामले का सत्यापन कर 17 जुलाई को ट्रैप बिछाया। विनोद साण्डे को कोरबा स्थित प्रार्थी के निवास स्थान पर रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया। उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 7 के तहत कार्रवाई की गई है।
🔹 शिक्षिका सहित सात की थी काउंसलिंग तय
विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, 17 जुलाई को युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया के तहत जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा जारी सूची में सात शिक्षकों की काउंसलिंग होनी थी। इसी सूची में शामिल शिक्षिका का नाम प्रमुखता से था। पूर्व में बीमारी के आधार पर उनका तबादला रोका गया था, परंतु नाम पुनः सूची में आने के बाद वे न्यायालय की शरण में गईं और निर्णय के बाद फिर से बेला स्कूल में पदस्थापना हुई।
काउंसलिंग कमेटी में कलेक्टर अध्यक्ष होते हैं और डीईओ सचिव रहते हैं। अधिकतर मामलों में प्रक्रिया का संचालन डीईओ द्वारा ही कर लिया जाता है। इसी प्रक्रिया में शिक्षिका की निकटवर्ती स्कूल में तैनाती की भूमिका को लेकर ही यह लेन-देन का मामला सामने आया।
🔹 क्या सिर्फ मोहरा है विनोद साण्डे?
विनोद साण्डे बेला स्कूल में शिक्षक है और रजगामार संकुल का समन्वयक भी है। जिस स्कूल (ओमपुर) में तबादला कराने की बात हो रही थी, वह इसी संकुल क्षेत्र में आता है। जानकारों की मानें तो संकुल समन्वयकों के पास तबादले का कोई अधिकार नहीं होता, ना ही वे काउंसलिंग कमेटी का हिस्सा होते हैं।
इससे यह संदेह मजबूत होता है कि साण्डे किसी बड़े तबादला नेटवर्क में सिर्फ एक माध्यम था और उसने यह कार्य कथित रूप से बीईओ-डीईओ के इशारों पर किया हो सकता है। ऐसे मामलों में संकुल समन्वयक को ही आगे कर, परदे के पीछे खेल खेला जाता है।
🔹 डीईओ और बीईओ पर भी उठे सवाल
वर्तमान घटनाक्रम में जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) की भूमिका सीधे संदेह के दायरे में है।
शिक्षा विभाग से जुड़े शिक्षक संगठन भी इस बात की मांग कर रहे हैं कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच हो, ताकि केवल “छोटी मछली” को नहीं, बल्कि पूरे “भ्रष्टाचार के जाल” को बेनकाब किया जा सके।
🔹 शिक्षा से अधिक ‘सुविधा शुल्क’ पर फोकस?
यह पहला मामला नहीं है जब शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार का ऐसा मामला सामने आया हो। पूर्व में भी अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य, हस्ताक्षर के नाम पर शुल्क वसूलना, पदोन्नति व पदांकन के नाम पर लेन-देन जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं।
अब तो युक्तियुक्तकरण की आड़ में ‘तबादला उद्योग’ एक संगठित ढांचे में काम करता दिख रहा है, जहां नजदीकी पदस्थापना के लिए रिश्वत एक सामान्य मांग बन चुकी है।
🔹 जांच और कार्रवाई की दरकार
शिक्षक समाज और विभाग से जुड़े लोगों की यह मांग है कि न केवल आरोपी शिक्षक, बल्कि उनसे जुड़े सक्षम अधिकारियों की आय और संपत्ति की भी जांच की जाए। यदि एसीबी इस केस की तह तक जाती है, तो संभव है शिक्षा विभाग के कई ‘काले चहरे’ उजागर हों।



