रायगढ़/एनटीपीसी माइनिंग लिमिटेड (NML) की तलाईपल्ली कोयला खनन परियोजना अब केवल एक कोयला खदान नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की ऊर्जा जरूरतों के बीच सेतु का काम कर रही है। परियोजना प्रमुख अखिलेश सिंह ने प्रेसवार्ता कर दी जानकारी, जनसंपर्क अधिकारी यश राज सोनी ने प्रेस मीट की औपचारिक शुरुआत की वहीं कंपनी के विभागीय अधिकारियों ने शॉर्ट फिल्म के जरिए तलाईपल्ली खदान की उत्पादन क्षमता, काम करने के तरीके, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक कार्यों की विस्तृत जानकारी साझा की।

आपको बता दें कि 15 अक्टूबर 2019 को शुरू हुई इस माइंस ने महज एक महीने के भीतर 16 नवंबर 2019 से उत्पादन शुरू कर दिया था,प्रोजेक्ट हेड अखिलेश सिंह ने कहा कि वर्तमान में एनटीपीसी तलाईपल्ली 11.5 मिलियन मीट्रिक टन का उत्पादन कर रहा है, लेकिन असली लक्ष्य तब हासिल होगा जब यह अपनी फुल रेटेड कैपेसिटी पर पहुँचेगा, जहाँ उत्पादन का आंकड़ा 25 मिलियन मीट्रिक टन तक जा पहुँचेगा।
खदान की आधुनिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ कोयले की गुणवत्ता जांचने के लिए स्वयं की एनएबीएल (NABL) कोल लैबोरेट्री है और सुचारू संचालन के लिए 132kv का सब स्टेशन स्थापित किया गया है,वर्तमान में खदान के पास 18 लाख टन कोयले का स्टॉक मौजूद है, जो 60 दिनों की जरूरतों के लिए पर्याप्त बैकअप प्रदान करता है।
परियोजना प्रमुख अखिलेश सिंह ने एनटीपीसी लारा सुपर थर्मल पावर प्लांट की कोयला जरूरतों पर विस्तार से जानकारी साझा की, उन्होंने बताया कि अगर एनटीपीसी लारा का 1600 मेगावाट का प्लांट पूरी क्षमता (फुल लोड) पर चलता है, तो उसे हर दिन 24,000 टन कोयले की जरूरत होती है,इस हिसाब से साल भर की कुल खपत लगभग 8.5 मिलियन मीट्रिक टन (85 लाख टन) बैठती है,वर्तमान में पावर प्लांट की जरूरत और खदान के उत्पादन की गति में अक्सर एक अंतर (गैप) बना रहता है।
भविष्य की तैयारी को लेकर श्री सिंह ने कहा कि जब एनटीपीसी लारा के फेज-टू की नई यूनिट्स चालू होंगी, तो कोयले की दैनिक खपत 24,000 टन से बढ़कर सीधे 48,000 टन हो जाएगी और सालाना जरूरत 17 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँच जाएगी। अखिलेश सिंह ने विश्वास दिलाया कि उस समय हमारी खदान की क्षमता भी 18 मिलियन मीट्रिक टन के पास होगी, जिससे हम प्लांट की पूरी रिक्वायरमेंट को न केवल अकेले पूरा कर पाएंगे बल्कि उनकी मांग से ज्यादा उत्पादन करेंगे। इतनी भारी मात्रा में कोयले की ढुलाई को सुगम बनाने के लिए कंपनी ने अपना खुद का एमजीआर (मरी-गो-राउंड) रेल सिस्टम और विशेष कोल कॉरिडोर भी तैयार किया है। वर्तमान में जो उत्पादन ज्यादा हो रहा है, उसे एनटीपीसी के 9 अलग-अलग प्लांट्स सिम्हाद्रि, सोलापुर, नवीन नगर, दल्लीपल्ली, बाढ़, फरक्का और टांडा को भेजा जा रहा है।
परियोजना प्रमुख अखिलेश सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि, आज की स्थिति में पूरी एनटीपीसी (NTPC) ऊर्जा क्षेत्र में बिजली बनाने के लिए प्रतिदिन लगभग 8 लाख टन कोयले की खपत कर रही है। इस कुल खपत में से एनटीपीसी माइनिंग लिमिटेड (NML) का प्रतिदिन का उत्पादन लगभग 1.65 लाख से 1.8 लाख टन के बीच है। उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि, हम अपनी 18% कोयला स्वयं यूज कर रहे हैं, जबकि शेष 82% बाजार से लिया जा रहा है। इसके साथ ही जो पावर प्लांट सीधे खदानों (माइन्स) के साथ जुड़े होते हैं, उन्हें ‘पिट-हेड’ (Pit-head) प्लांट कहा जाता है।
ऊर्जा के वैश्विक परिदृश्य पर चर्चा करते हुए प्रोजेक्ट हेड अखिलेश सिंह ने बताया कि भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता अभी लगभग 5,20,000 मेगावाट है, जिसे 2030 तक 7.5 लाख मेगावाट तक पहुँचाने का लक्ष्य है। उन्होंने फ्रांस का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां 60% से ज्यादा बिजली न्यूक्लियर से आती है।
इसी राह पर चलते हुए भारत भी अब न्यूक्लियर क्षेत्र में 1 लाख मेगावाट अतिरिक्त क्षमता जोड़ने की योजना पर काम कर रहा है, जिसे अमलीजामा पहनाने में 8 से 10 साल का समय लगेगा। बढ़ते तेल संकट और प्रदूषण को देखते हुए अब रेलवे भी डीजल इंजन हटाकर इलेक्ट्रिक इंजन अपना रहा है क्योंकि प्लांट में प्रदूषण को तकनीक से एक ही जगह नियंत्रित करना ज्यादा आसान है।
श्री सिंह ने बताया कि पिछले 5 सालों में भारत में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 965 यूनिट से बढ़कर करीब 1460 यूनिट के स्तर पर पहुँच गई है। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि पहले एसी विलासिता थी, पर आज यह हमारी बुनियादी जरूरत बन गई है। जिस देश में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत जितनी ज्यादा होती है, उस देश की अर्थव्यवस्था को उतना ही मजबूत माना जाता है।
पत्रकारों के सवालों पर श्री सिंह ने कोयला उत्पादन की लागत का गणित समझाते हुए कहा कि कुल खर्च में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा डीजल का होता है और 6 से 7 प्रतिशत खर्च विस्फोटकों पर आता है। उन्होंने एक बड़ा बिंदु रखते हुए बताया कि विस्फोटक बनाने में जिस ‘अमोनियम सल्फेट’ का उपयोग होता है, वही खाद के रूप में खेती में भी इस्तेमाल होता है। ऐसे में डीजल के दाम बढ़ने या अमोनियम सल्फेट की कमी होने से न केवल कोयले की कीमत बढ़ेगी, बल्कि हमारी खेती पर भी इसका असर पड़ेगा। श्री सिंह ने बताया कि एनएमएल अब भारत की तीसरी सबसे बड़ी कोयला उत्पादन करने वाली कंपनी बन चुकी है।
पर्यावरण को बचाने के लिए तलाईपल्ली में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक प्रयोग होने जा रहा है,यहाँ 10,000 करोड़ रुपये की लागत से देश का पहला ‘कोल गैसीफिकेशन’ पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा रहा है,इसके तहत कोयले को सीधे गैस (सिन गैस) में बदला जाएगा, जिससे खाद और भविष्य का ईंधन यानी ‘ब्लू हाइड्रोजन’ तैयार होगा,यह भारत में अपनी तरह का पहला बड़ा प्रयोग है जिसके लिए मंजूरी भी मिल चुकी है और काम भी शुरू हो गया है।
वही विकास कार्यों की बात करें तो एनटीपीसी तलाईपल्ली ने अब तक प्रभावित गांवों में स्कूल, अस्पताल और वाटर हार्वेस्टिंग जैसे कामों पर 59 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए हैं, स्थस्नीय लोगों को रोजगार भी दिया है,खदान के पास 310 हेक्टेयर में डंप एरिया बनाया गया है और लाखों पेड़ लगाकर पर्यावरण का ख्याल रखा जा रहा है,
प्रेस मीट के दौरान अन्य अधिकारियों ने भी कर्मचारियों की कॉलोनी और स्थानीय विकास की विस्तृत जानकारी साझा की, जिससे साफ है कि एनटीपीसी प्रगति और प्रकृति को साथ लेकर चल रही है…




