रायगढ़ /रायगढ़ जिले में तमनार ब्लाक के ग्राम पंचायत सराईटोला में हाल ही में जंगल की कटाई को लेकर माहौल गरमाया हुआ है,जिसमे नित नए खुलासे हो रहें है,अब यहां जंगल काटने की पर्यावरणीय अनुमति के लिए फर्जी ग्राम सभा आयोजित करने की जानकारी सामने आ रही है, इसके लिए न तो वैध प्रक्रिया अपनाई गई और न ही स्थानीय आदिवासी समुदाय की सहमति लेना जरूरी समझी गई,

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिस ग्राम सभा के दस्तावेजों के आधार पर जंगल की कटाई को वैध बताया गया, उसमें न ग्राम सभा की तिथि दर्ज है और न ही वह ग्राम सभा वास्तव में आयोजित की गई थी, दस्तावेजों में जयशंकर राठिया को ग्राम सभा का अध्यक्ष बताया गया है,जबकि जांच में सामने आया कि इस नाम का कोई व्यक्ति सराईटोला पंचायत में है ही नहीं-???


इतना ही नहीं उस दिन ग्राम सभा में कलेक्टर के प्रतिनिधि के रूप में कौन सा अधिकारी उपस्थित था इसका भी कोई उल्लेख रिकॉर्ड में नहीं है, न तो इसकी फोटोग्राफी की गई, न ही वीडियोग्राफी हुई, जो कि ग्राम सभा की पारदर्शिता के लिए एक बेहद जरूरी प्रक्रिया होती है,सबसे बड़ी बात उस ग्राम सभा में वन विभाग का कोई नुमाइन्दा भी मौजूद नहीं था ?

इस तरह एक फर्जी ग्राम सभा दर्शाकर पर्यावरणीय स्वीकृति दी गई जिसका सीधा नुकसान वहां की जैवविविधता, जंगल और सबसे अधिक वहां रहने वाले आदिवासी समुदाय को उठाना पड़ रहा है,
प्रदेश में ये भू -भाग आदिवासी समुदाय की पहचान उनकी संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से गहराई से जुड़ी है,उनका जीवन जल जंगल और जमीन से ही चलता है,जंगलों से मिलने वाले महुआ, तेंदूपत्ता, सरई बीज, जड़ी-बूटी, मसरूम, भाजी, करील जैसे वन उत्पादों से वे अपनी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं, नदियों से मछली, घोंघा, केकड़ा पकड़कर, और पशुपालन के माध्यम से वे अपना जीवन यापन करते हैं।
वही जब विकास के नाम पर कोयला, बॉक्साइट, लोहा जैसे खनिजों की खुदाई होती है,जिसके लिए जंगलों की अंधाधुंध कटाई होती है तो वहां सबसे पहले आदिवासी ही प्रभावित होते हैं, उनकी खाद्य सुरक्षा, आजीविका, स्वास्थ्य और शिक्षा सभी पर संकट गहराने लगता है,
सरकार भले ही पेसा कानून, वन अधिकार कानून, रोजगार गारंटी कानून और खाद्य सुरक्षा जैसे अधिकारों की बात करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ये कानून नौकरशाही की फाइलों में दम तोड़ रहे हैं……….



